बेघर बच्चे उन्हें कहा जाता है जिनका परिवार फुटपाथ पर रहता है या जो बच्चे अपने घर से भागने के बाद फुटपाथ पर रहते हैं बुनियादी सुविधाओं और जीवन में आगे बढ़ने के अवसर से दूर ये बच्चे सुरक्षा से भी वंचित हैं. क़ानूनों और कोशिशों के बावजूद बच्चों को बाल श्रम, तस्करी और शोषण में धकेला जाता है. महामारी के दौरान बच्चों की स्थिति और भी ख़राब हुई क्योंकि लोगों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी, स्कूल बंद हो गए. महामारी के दौरान पढ़ाई में रुकावट का असर बच्चों पर पड़ा, स्कूल बंद होने से पढ़ाई करने वाले बच्चों की संख्या घटी. लॉकडाउन और उसके बार-बार बढ़ने से लगभग बच्चे बहुत ज़्यादा प्रभावित हुए. ये बच्चे ग़रीब और सुविधा से वंचित परिवारों से आते हैं जैसे कि प्रवासियों के बच्चे, ग्रामीण क्षेत्रों में खेत में काम करने वाले बच्चे और बेघर बच्चे.
बच्चों का बेघर होना कई तरह के कारणों का नतीजा है. गांवों से शहरों की ओर जाना, कम उम्र में और ज़बरन शादी, बेरोज़गारी, बाढ़, सूखा या किसी अन्य आपदा की वजह से विस्थापन, ग़रीबी, घर में हिंसा, परिवार का बिखरना, ठौर-ठिकाने की कमी, एचआईवी/एड्स और कुष्ठ जैसी बीमारियां, युद्ध एवं आंतरिक विस्थापन जैसी सामाजिक घटनाएं बेघर बच्चों के कारण बताए जाते हैं.
कुपोषण, भूख और बेरोज़गारी का सामना कर रहे ये बच्चे आम तौर पर चोरी
की घटनाओं को अंजाम देते हैं, मादक पदार्थों का सेवन करते हैं और बाल मज़दूरी में लगे
होते हैं. बेघर लड़कियां यौन शोषण, शारीरिक
दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का सामना करती हैं और अक्सर ऐसी घटनाएं सामने भी नहीं आ
पाती हैं. युद्ध और देश
के भीतर आंतरिक विस्थापन भी बच्चों को बेघर बनाते हैं
लड़कियों को उनके घर, स्कूल और शरणार्थी शिविरों से उठाया जाता है और फिर
मज़दूरी, यौन ग़ुलामी और ख़रीद-बिक्री के लिए उनका शोषण होता है.
इस तरह के शोषण के मनोवैज्ञानिक असर से बच्चों में बेचैनी, डिप्रेशन, पोस्ट-ट्रॉमैटिक
स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीएसटीडी) और मादक पदार्थों का सेवन बढ़ जाता है. सड़कों के
किनारे रहने वाले बच्चे इनहेलेंट से लेकर सिगरेट तक और कोकीन, स्मैक और चरस जैसे कई तरह के मादक पदार्थ ले रहे हैं. इस मुद्दे पर अभी तक किसी सर्वे के आधार पर आंकड़े का
नहीं होना समस्या को और बढ़ाता है. समाज विरोधी इस समस्या का आकलन कहीं नहीं किया
जा रहा है फुटपाथ पर
ग़रीबी में गुज़र करने वाले बच्चों, उनको होने
वाली बीमारियों, कुपोषण, लत और उनके द्वारा किए गए अपराध के साथ-साथ वो जिस शोषण
का सामना कर रहे हैं, उस पर कोई आंकड़ा नहीं, बेघर बच्चों की सामाजिक विकृति के लिए चिंता समय के साथ
कमज़ोर होती जा रही है.
आमदनी की कमी
अक्सर बेघर बच्चों को दुर्व्यवहार और मानसिक बीमारी से जुड़े मुद्दों का सामना
करने वाला वर्ग बनाती है. बीमारी होने की आशंका ख़ास तौर पर एचआईवी/एड्स और
यौन संक्रमण से जुड़ी बीमारियों का ख़तरा भी ज़्यादा रहता है यौन शोषण और दुर्व्यवहार बेघर लड़कियों में जल्दी और
किशोर अवस्था में गर्भवती होने का ख़तरा बढ़ जाता है. इस परिस्थिति में उनकी सेहत
की अच्छी देखभाल नहीं हो पाती है जिससे उनके मरने का ख़तरा बढ़ जाता है. व्यक्तिगत
पहचान के दस्तावेज़ों की कमी और स्कूल में नाम नहीं लिखाने की वजह से स्वास्थ्य और
पोषण कार्यक्रमों का वो इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं. खाद्य सुरक्षा और घर तक राशन
ले जाने की योजना उनकी पहुंच के बाहर हो जाती है.
हज़ारों
बच्चों को अगवा कर उन्हें भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है. इस तरह बेघर
बच्चों की समस्या में बढ़ोतरी होती है बेघर बच्चों को ज़बरन और धोखे में
रखकर मानव तस्करी का शिकार बनाया जाता है. और लड़कियों को तो वेश्यावृत्ति में भी
धकेल दिया जाता है.
बच्चों का
मार्गदर्शन करने वाले क्लीनिक, मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और डॉक्टर होने चाहिए. ये भी ज़रूरी है कि हर
राज्य में बेघर बच्चों की सटीक संख्या का पता लगाया जा सके, उन जगहों का पता चल सके जहां बेघर बच्चे सबसे ज़्यादा हैं
और इसके कारण क्या हैं. ऐसे बच्चों के पुनर्वास पर भी ध्यान देना
चाहिए ताकि ये बच्चे फिर से शोषण का शिकार बनने से बच सकें.
(अपने विच1र)
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